कुमाउंनी भाषा में संधि-भाग- 14

 

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कुमाउंनी भाषा में संधि

मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग- 14

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संकलन - भीष्म कुकरेती

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संधि दो ध्वनियों का जुड़ कर एक हो जाना है.

कुमाउंनी में दो तरह की संधियाँ पाई जाती हैं -

अ- स्वर संधि

ब- व्यंजन संधि

स्वर संधि के उदहारण

१- आन , इन, उन आदि का प्रयोग

च्याला = आन = च्यालान (आ+ आ = आ)

चेलि + इन = चेलिन (इ+ ई = ई )

गोरु = उन = गोरून (उ + ऊ = ऊ )

२- औट का प्रयोग

ओ + ओ = औ

तलौटो ( तलो + औ + ओ )

डलौटो ( डलो +औट +ओ )

व्यंजन संधि के उदाहरण

१- यदि पहले पद का ग् हो और दूसरा पद आदि ध्वनि ह् हो तो ग् और ह् = घ

आग् + हाल्नो = अघानो

२- लघु रूपता

अ- रुपिमिक अवस्था से प्रतिबंधित के पूर्णांक गणनात्मक संख्या वाचक रुपिमो के परस्पर जुड़ने पर -

तीन + बीस = तेईस

चार = बीस = चौबीस

ब- महाप्राण 'ठ' के पश्चात ह्रस्व ह आने से जोड़ शब्द में ह लोप हो जाता है

कांठा +हाल्नो = कांठान्नो

स- पहले पद का द्वित व्यंजन के दुसरे व्यंजन के आदि नजन के जोड़ में कभी कभी द्वी तत्व नही रह जाता है

अन्न +जल = अंजल

द- नासिक्य स्पर्श युक्त संख्या वाचक विशेषणों में विशेषण व्युत्पादक पर प्रत्यय अथवा स्वतंत्र रु से जुड़ने पर नासिक्य का लोप हो जाता है

तीन + बीस = तेईस

तीन + तीस =तैंतीस

ध- पूर्णांक गणनात्मक संख्या के साथ -गुण प्रत्यय जुड़ने से ध्वनि लोप है या कहीं ह्र्स्वी करण विद्यमान रहता है

१- तीन +गुनो= तिगिनो

चार + गुनो = चौगुनो

२- सात + गुनो =सतगुनो

आठ +गुनो = अठगुनो

न-- दो स्वतंत्र रूपिम समीप आंयें तो जुड़ने पर पहले के अन्त्य स्वर का लोप हो जाता है

गाड़ा+ ख्याता = गाड़ख्याता

गोरु + बकरा = गोरबकरा

ठुला + नाना = ठुल्नाना

प- यदि पहले पद का व्यंजनान्त और दुसरे पद का आदि व्यंजन समान हों तो तो एक का लोप हो जाता है

नाक = कटि =नकटि

नाक =कटो = नकटो

फ- ह्र्स्वीकरण और प्रतिस्पथान में लाघुरुप्ता हो जाती है

सात +ऊँ = सतूं

तेरा = ऊँ = तेरुं

भ- व्यंजन का अंत प्रतिपादक के उपरान्त यदि प्रत्यय आदी व्यंजन हो तो संयोग में प्रतिपादक व्यंजन ह्रस्व हो जाता है

कम + नि = कम्नि

म- ध्वनात्मक समानता -

रुपिमिक अवस्था से प्रतिबंधित सीमा में गणनात्मक संख्यावाचक प्रतिपादक जैसे चालीस, तीस पहले उन जुड़ने से परवर्ती व्यंजनध्वनि लोप हो जाती है

उन + चालीस-= उन्तालिस (उनचालीस)

गं - विस्तार

योगिक क्रिया में विस्तार हो

द्वि + सरो = दुसोरो

तीन + सरो = तिसोरो

संदर्भ :

१- अबोध बंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली

२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल

३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद

४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून

५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला

६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून

७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत

८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत

९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ

१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल

११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल



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