सुन्दर हो बेटी;प्यारा हो बेटा


सुन्दर हो बेटी;प्यारा हो बेटा

 

खुला-खुला सा लग रहा आसमाँ;बदली सी मुझको लगे ये धरा।

ये कैसी बयार है बह रही!बेहिचक;बेखौफ घर से मैं चल पड़ी।

 

बेटी बचाओ; बेटी पढ़ाओ की गूँज जब से सुनाई दी पड़ी।

अपना-अपना सा लग रहा जमाना;मुझे मेरे वजूद का अहसास हो रहा है।

 

वो डरना;सहमना;वो सकुचा के चलना ये सब आज मैं भूल के चली।

बेटी बचाओ;बेटी पढ़ाओ की गूँज जब से सुनाई दी पड़ी।

 

पर भेद फिर भी ये हो रहा है; बेटा इस गूँज में कहीं खो रहा है।

पिता के बिना कैसी ये बेटी?बहन भी तभी जब हो साथ भाई।

 

"बेटी बचाओ ;बेटों को न भूलो" ये गूँज मुझको सुनाई दे रही।

'अति' कहाँ होती है भली?'अति' की लकीर को नहीं पीटना।

 

बेटी को सम्मान ;बेटे को संस्कार की है जरूरत।

तो " सम्मान दो;संस्कार सीखो" की गूँज अब सुनाने की है घड़ी।

 

तब कुछ अलग सा लगेगा जमाना;प्रभु का सब में दीदार होगा।

हो पुरुष कोई अनजान;साथी;पिता या हो भाई;मुझे सम्मान सब से मिलेगा।

 

सुन्दर हो बेटी;प्यारा हो बेटा;धरा की ये बगिया महक तब उठेगी।

 

सुनीता ध्यानी

सर्वाधिकार सुरक्षित।

[महिला दिवस की बधाई! भविष्य में कहीं पुरुष दिवस न मनाना पड़े अत:बेटों को अच्छी शिक्षा व संस्कार दें!]


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ