शम्भो
वे से ही च ब्याळि आज,
जिंदगी को साज-बाज,
भूख तीस वे से ही च,
वे से ही ज काम-काज,
वे से ही च अन्न पाणी,
स्याणी-गाणी,काम-धाणी,
वे से ही त जिंदगी,
बणीं च आज इतगा स्वाणी,
नौं ऊंको भी ल्यावा धौं,
सुमिरन कारा धौं,
जीवन तर जालो भयौं,
याद कैरी द्याखा धौं,
भक्ति ऊंकी कारा छुचौं,
नौं च जौंकु आदियोगी,
डमरुधारी शम्भो शंकर,
कैलासूँ मा रैंद जोगी....
आकृति मुण्डेपी

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