*झणि कख हर्चिगे*

उत्तराखंड की लगूली

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*झणि कख हर्चिगे*

 

मिल छाण्याल सर्या भितरखण्ड,

एक- एक कूणा कुमच्यरा

थब भी हेर्याल भलि कै,

पर, वा मिलणी नी....

 

न ह्वा घाम दगड अछेगे ह्वेली,

या ह्वे सकद असमान म,

गैणौं दगड चमकणी हो,

या बथौं बणी चलिगे हो मीसे दूर,

धरती- अगास भी खोज्याल,

पर, वा मिलणी नी....

 

न ह्वा क्वी मी से लुकैकी,

ल्ही गे हो अफ दगड,

या म्यारु हथ छोडी चलगे हो वा,

कखि रिबड त नि ग्याई कै अजाण बाटा फर,

आंदा जांदा बट्वे पूछ्यलीं,

पर, वा मिलणी नी....

 

जावा रे छुचौं वीं खोजी ल्यावा,

म्यारु त जन पराण च वा,

वीं बगैर अधूरी सी ह्वे ग्यों,

झणि कख हर्चिगे, मेरी हैंसी....

 

        - आकृति मुण्डेपी

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