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*झणि कख हर्चिगे*
मिल छाण्याल सर्या भितरखण्ड,
एक- एक कूणा कुमच्यरा
थब भी हेर्याल भलि कै,
पर, वा मिलणी नी....
न ह्वा घाम दगड अछेगे ह्वेली,
या ह्वे सकद असमान म,
गैणौं दगड चमकणी हो,
या बथौं बणी चलिगे हो मीसे दूर,
धरती- अगास भी खोज्याल,
पर, वा मिलणी नी....
न ह्वा क्वी मी से लुकैकी,
ल्ही गे हो अफ दगड,
या म्यारु हथ छोडी चलगे हो वा,
कखि रिबड त नि ग्याई कै अजाण बाटा फर,
आंदा जांदा बट्वे पूछ्यलीं,
पर, वा मिलणी नी....
जावा रे छुचौं वीं खोजी ल्यावा,
म्यारु त जन पराण च वा,
वीं बगैर अधूरी सी ह्वे ग्यों,
झणि कख हर्चिगे, मेरी हैंसी....
- आकृति मुण्डेपी

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