गढ़वाली में औच्चारणिक विभेद

उत्तराखंड की लगूली

हिन्दी   ।  गढ़वाली ।    ।  गजल  ।  अन्य  ।  कवि  ।  कवयित्री  ।  लेख  ।

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 गढ़वाली गीत


गढ़वाली में औच्चारणिक विभेद


 भाषा विकास की एक निश्चित प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में व्यक्तिबोली- बोली- उपभाषा- भाषा- राजभाषा- राष्ट्रभाषा- विश्वभाषा। गढ़वाली भाषा ने अपने चार चरण पूरे कर लिये हैं। पांचवें चरण के लिए गढ़वाली व्याकरण एवं शब्दकोशों के प्रकाशन हो जाने से गढ़वाली के औच्चारणिक विभेद पर चर्चा होने लगी है। 20-22 जून, 2019 को दून विश्वविद्यालय में औच्चारणिक विभेद पर कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में गढ़वाली के 35 साहित्यकारों एवं भाषा जानकारों ने भाग लिया था। यह कार्यशाला डा०अचलानंद जखमोला जी कि अध्यक्षता, लोकेश नवानी जी अर डा० जयन्ती प्रसाद नौटियाल जी के निर्देशन में डा० नंदकिशोर ढौंडियाल जी, अरविंद पुरोहित जी, गणेश खुगशाल 'गणी' जी, बीना बेंजवाल जी, डा० जगदम्बा कोटनाला जी, वीरेन्द्र डंगवाल 'पार्थ' जी, डा० सुरेश ममगांई जी, डा० सत्यानंद बडोनी जी, मदन मोहन डुकलान जी, गिरीश सुन्दरियाल जी, दिनेश ध्यानी जी, ओम बधाणी जी, संदीप रावत जी, डा० प्रीतम अपछ्याण जी, नीता कुकरेती जी, बीना कण्डारी जी, मधुरवादिनी तिवारी जी, सुमित्रा जुगलान जी, रमाकान्त बेंजवाल, देवेन्द्र जोशी जी, सुरेन्द भट्ट जी, देवश आदमी जी, ओम प्रकाश सेमवाल जी, शान्ति प्रकाश जिज्ञासु जी, धनेश कोठारी जी, अरविंद प्रकृति प्रेमी जी, धर्मेन्द्र नेगी जी, डा० वीरेन्द्र बर्त्वाल जी, हरीश कण्डवाल ’मनखी’ जी आदि की उपस्थित में संपन्न हुई थी ।

औच्चारणिक विभेद पर इन बिंदुओं पर सहमति बनी:-

1- सभी भाषाओं का इतिहास है कि वे कठिन से सरल की ओर अग्रसर होती हैं। आज गढ़वाली में सभी विधाओं में लेखक सरलता की ओर बढ़ रहे हैं जिससे पढ़ने वालों को आसानी हो रही है। आधे अक्षर जहाँ बहुत जरूरी हों वहीं प्रयोग किए जाएँ।

2- गढ़वाली भाषा के अधिकांश विद्वान संज्ञा और क्रिया के मूल पदों को ईकारान्त किए जाने की बात करते रहे हैं लेकिन ज्यादातर गढ़वाली लेखक इकारान्त का ही प्रयोग कर रहे हैं तथा गढ़वाली की मूल ध्वनि भी इकारान्त ही है। जैसे- अपनी (अपणि), अपनी ही (अपणी), तुम्हारी (तुमारि), तुम्हारी ही (तुमारी), पानी (पाणि) आदि।

3- व्यावहारिक शब्दों में उकारान्त और ओकारान्त का प्रयोग अपनी-अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं। जैसे- मेरु/मेरो, पुंगड़ु/पुंगड़ो, नथुलु/नथुलो आदि।

4- जैसे हिंदी को मानक स्वरूप बनाने के लिए मेरठ के आसपास की खड़ी बोली को आधार बनाया गया वैसे ही सिरनगर्या गढ़वाली को आधार माना गया। गढ़वाल के बाकी इलाकों के शब्द पर्यायवाची के रूप में प्रयोग होते रहेंगे।

5- सम्बन्ध कारक की जहाँ तक बात है हम हिंदी की तरह का, को, कु रूप में लिख रहे हैं। जबकि गढ़वाली के संज्ञा अर सर्वनाम के साथ सम्बन्ध कारक जोड़ा जाता है। जैसे- पिताजी का कोट (बुबौ कोट), बड़े भाई की किताब (भैजी किताब), भाषा की जानकारी (भाषै जाणकारि), भाषा का इतिहास (भाषौ इत्यास) आदि।

5- गढ़वाली बोलने में ‘ष’ और ‘श’ का प्रयोग नहीं होता है पर लिखने में ‘ष’, ‘श’, ‘स’ तीनों का प्रयोग हो रहा है। ऐसा तय हुआ कि तीनों का प्रयोग अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं।

6- ‘ळ’ और ‘ल़’ ध्वनि पर भी बातचीत हुई। यह तय हुआ कि सुविधानुसार दोनों का प्रयोग कर सकते हैं। ‘है’ के लिए भी अपनी सुविधानुसार ‘च’ या ‘छ’ का प्रयोग कर सकते हैं।

7- क्रिया रूपों पर गहन चर्चा के बाद तय हुआ कि क्रिया का मूल पद अकारान्त होगा और तीनों कालों में इनका रूप इस प्रकार होना चाहिए। जैसे- पढ़ना (बांचण), पढ़ दिया (बांच्यालि), पढ़ा (बांचि), पढ़ता है (बांचद), पढ़ रहा है (बांचणू छ), पढ़ेगा (बांचलु/बांचलो) ।

8- अगर गढ़वाली का एक मानक रूप बन जाएगा तो उसमें पत्रचार करने में भी सुविधा होगी और इससे प्रिंट मीडिया भी उसी रूप को अपनाएगा।

9- मानक रूप बनने से सबसे ज्यादा फायदा पाठ्यक्रम बनाने में होगा। संविधान की आठवीं अनुसूची में गढ़वाली शामिल हो, हम दमदार ढंग से अपनी बात रख सकते हैं। 

 इस कार्यशाला में जिन व्यावहारिक शब्दों का औच्चारणिक मानक तय हुआ है वे इस प्रकार हैंः-

हिन्दी

गढ़वाळि

मैं

मि

तू

तु

तेरी

तेरि/त्यारि

तेरा

तेरु/त्यारु

तुम

तुम

तुमने

तिन/तुमुन

तुम्हारा

तुमारो

तुम्हारे लिए

त्वेतैं/त्वे खुणि/त्वेकु

तुम्हारे

त्वे/तुमा तैं

तुम्हारे पास

 त्वेमु/ तुम मू

हम

हम

यह

यु (पु०), या (स्त्री०)

वह

वु , सु (पु०), वा, स्या (स्त्री०)

वहाँ

वख

वहीं

वखि

वहाँ

वखौ

उधर

उनैं/उनां

उतना ही

उतगै

इस ओर

यनैं/इनै

उस कारण

वां लै

उसके लिए

वैकु/ वे तैं

उस

वीं (स्त्री०), वे (पु०)

इस

यीं (स्त्री०), ये (पु०)

इसका

यींकु (स्त्री०),   येकु (पु०)

इसकी

यींकि

इससे

 यां से/ यीं से

उतना

उतगा

कौन

को

क्या

क्य

वे/वो

सि, स्या

जो

जो/जु

जिन्होंने

जौंन

उनके

तौंका,वूंका

मेरा

मेरा,मेरो

मेरी

मेरि

उसका

वेकु/वेको

हमारा

हमारो

हमारी

हमारि

मुझे

मि तैं

तुझे

त्वे तैं

तुम्हें

तुम तैं, त्वे तैं

 

 

सम्बन्ध-कारक

हिन्दी

गढ़वाळि

भाषा की

 भाषै

भाषा का

भाषौ

पिताजी का

बाबौ, बुबौ

देश का

देसौ

मानकीकरण की

मानकीकरणै

मुल्क का

मुल्कौ

मामा का

मामौ

ताऊ जी का

बोडौ

सलाण की

सलाणै

श्रीनगर का

सिरनगरौ

गढ़वाली की

गढ़वाळ्यौ

गढ़वाली के

गढ़वाळ्या

उत्तराखण्ड का

उत्तराखण्डौ

उत्तराखण्ड की

उत्तराखण्डै

पहाड़ की

पाड़ै

माँ की याद

ब्वेकि खुद

भाई की चिट्ठी

भुलै चिट्ठी/ भैजी चिट्ठी


 

कर्ता-कारक

हिन्दी

गढ़वाळि

माँ ने

ब्वेन/माँन

साथियों ने

दगड़्योंन

उसने

वेन

ग्वालों ने

ग्वेरोन/ग्वेरुंन


विशेषण

हिन्दी

गढ़वाळि

सब, सारा

 सबि, सैरो

एक

एक

दो

द्वी

बड़ा

बड़ो

लम्बा

 लम्बो

छोटा

छोटो

गढ़वाली

गढ़वाळि

घुला-मिला

रळ्यूं-मिळ्यूं

गला

गौळ, कंठ

और

हौर

पक्षधर

धड़्वे

सुविधाजनक

 सौंगु, गवाळो

असुविधाजनक

असौंगु, अगवाळो

तीक्ष्ण, तेज

 पैण्डो, पैनो

कुंद, भोथरा

खुण्डो

कठिन कठिण,

असौंगो

सरल

सौंगो

पाठक

पढ़दरो, पढ़दरा (ब-व-)

लेखक

लिख्वार

श्रोता

सुणदरा

सुंदर (पु०)

स्वाणो, बिगरैलो, स्वाणिलो

सुंदर (स्त्री०)

स्वाणी, बिगरैलि, स्वाणिलि

अच्छा

अच्छो, भलो

पतला

पतळो

बिगड़ा

बिगड़्यूं

सुधरा

सुधर्यूं

फटा

फाट्यूं/चिर्यूं

गुस्सैल (पु०)

गुस्साबाज, गुस्सैल

गुस्सैल (स्त्री०)

गुस्सैलि

हँसमुख

हँसमुख

होशियार

होस्यार

गोरा

ग्वारो

काला

काळो

काली

काळि

सांवली

सौंळि

मटमैला

मटण्यां

लाल

 लाल

पीला

पिंगळो

भारी

गर्रो

जला हुआ

फुक्यूं

सूजा हुआ

उस्यायूं

उबला हुआ

उज्यायूं

आधा कच्चा

अदकचो

बीमार

बिमार, दुख्यारु, रोगिलु

घायल

घैल, अदघैल

मैला

मैलो

टूटा हुआ

टुट्यूं

सहिष्णु

सूरो

हरा

हैरो, हैरी (स्त्री०)

सफेद

सफेद, धौळ्या

गर्म

तातो, गरम

ठंडा

ठंडो, चस्सो, ऐड़ो

पूरा

पूरो, सैडो, सैरो

नया

नै, नयो, नौलो, नवाड़

गोल

गोळ

सूखा

सूखो

नाजुक

क्वांसो (पु०) क्वांसि (स्त्री०)

ऐतिहासिक

ऐत्यासिक

सजग

चिताळो, चेतनि

थोड़ा

थोड़ा, जरा, इछि

पागल

बौळ्या

भुलक्कड़

बिसर्वा

प्यासा

 तिसाळो

डरपोक

डरखु, डरख्वा

झगड़ालू

झगड़ैल, लड़्वाक

दूसरा

 हैंको

दूसरी

हैंकि

 


अव्यय/क्रिया विशेषण

हिन्दी

गढ़वाळि

अचानक

अचणचक

पहले

पैलि

नजदीक

नजीक, नेड़ो, धोरा

दूर

 दूर

आगे

 ऐथर, अगनै, अगाड़ी

पीछे

 पैथर, पिछनै, पिछाड़ी

ऊपर

ऐंच, उब्ब, मत्थि

आजकल

अजक्याल, अजब्यिाळ

कल

(बीता हुआ) ब्याळि

कल (आने वाला)

भोळ

परसों (आने वाला)

परस्यो

परसों (बीता हुआ)

 परसि

अभी

अबि, अबरि

नहीं

 ना

अभी-अभी

अबि-अबि

जल्दी

सनक्वािळ, चणै, झट

ध्यानपूर्वक

यकलग, टक्क लगैकि

भली प्रकार से

अंक्वैक, भलिकै

बायीं तरफ

बैं तरपां

किनारे

किनर

दाहिनी ओर

दैं तरपां

अबकि बार

अबरि दां

सब जगह

संग्ति

साथ-साथ

दगड़ा-दगड़ि

धीरे-धीरे

मठु-मठु

आस-पास

ओडु-नेडु, ओरा-धोरा

इस ओर

इनैं


 

संज्ञा शब्द

हिन्दी

गढ़वाळि

पत्थर

ढुंगो (ए०व०), ढुंगा (ब०व०)

रेत

बळु/बळो

धरती

धर्ति

बादल

बादळ

धुआँ

धुवां

आग

आग

अग्निकांड

 अग्यों

राख

छारु, रख्या, खारु, रंगणु

सड़क

सड़क

पहाड़

पाड़

पहाड़ी

पाड़ी

दिन

दिन

रात

रात

नाम

नौं

खेत

पुंगड़ो (ए०व०), पुंगड़ा (ब०व०), डोखरा (ब०व०)

त्योहार

त्यवार

ब्यवहार

ब्यवार

महात्म्य

माथम

समय

समै, टैम

वक्त

बग्त

समुद्र

समोदर

हौसला

हौसला

उत्साह

हौंस

आनन्द

रौंस

साहस

सांसु

यात्रा

जातरा, जात

स्वाद

सवाद, रसाण

पीढ़ी

छिवाळ

सूरत

अन्वार, अंद्वार

विकास

बिकास

तरक्की

तरक्कि

उन्नति

उन्नति

आरम्भ

सुर्वात

बचपन

बाळापन, छोटाछौंद

किलकारी

किलक्वारि

झरना

छंछड़ो, छौड़ो

कौशल

सल्ल, हुनर

शऊर

 सगोर

शुभारंभ

पवांण

विश्लेषण

छाळछांट

कठिनाई

कठिनै

इतिहास

इत्यास

दुनिया

दुन्या

रचना/सृजन

रंचणा, रचना

हवा

हवा

तेज हवा

बथौं

आंधी/अंधड़

औडळु

गला

गौळो, कंठ

आँख

आंखु

नाक

 नाक

मुँह

गिच्चु

दाँत

दांत

जीभ

जीब

नाखून

नंग

पैर

खुट्टु, खुट्टा (ब०व०)

घुटना

घुंडु

हाथ

हात

पेट

पोटगु

गरदन

मोण, धौण

कंठ

कंठ्याळो

जिगर

बुकड़ि

छाती

छाति

दिल

जिकुड़ि

चेहरा

मुखड़ि

यकृत

लीवर

कलेजा

कळेजो

उंगली

अंगिुळ

होंठ

ओंठ

कांख

कखऱिाळ

कपाल

कपाळ

कंधा

कांध, ब्यूंद

कोहनी

क्वीनो

गाल

गलोड़ि

चिबुक

च्योंठि

जांघ

जांगड़ो

मूँछ

जोंगा

टांग

टंगड़ि

दाढ़ी

दाड़ि

दाड़

दाढ़ि

एड़ी

फ्यफनो

सिर

मुण्ड, बरमण्ड

खून

ल्वे

बाँह

बौंफर, सांपड़ि

हथेली

हतगिुळ

लटें

लटुला

तालु

नकताळु

शाम

ब्यखुनि

गोधूलि

रुमुक

प्रश्न

सवाल

उत्तर

जबाब

उत्तर-प्रत्युत्तर

स्वाल-द्वाल

पलायन

पलायन

बातचीत

छ्वींबथ

घपला

घपरोळ

जरूरत

जर्वत

असमंजस

घंघतोळ

वसंत

मौळ्यार, बसंत

दीवार

पाळ, दिवाल

हेमन्त

 ह्यूंद

तरीका

तरिका

आदत

ढब

जुगाड़

ब्यूंत

प्रकाश

उदंकार

भुलक्कड़ी

 बिसरंत

सूरज

सूरज

चाँद

जोन

तारा

गैंणा

गहना

 गैणा

पानी

पाणि

बारिश

बरखा

औरत

 जनानि, बैरबान

बेटी

ब्यटुलो

पुरुष

बैख

आदमी

आदमि

मनुष्य

मनखि

मछली

माछो

चिड़िया

चखुलो, पोथलो (पु०) चखुलि, पोथलि (स्त्री०)

कुत्ता

कुकुर

बिल्ली

बिराळो (पु०), बिरािळ (स्त्री०)

पेड़

डाळो (पु०), डािळ (स्त्री०)

बीज

बीज

पत्ती

पात, लाबो (बड़ा पत्ता)

जड़

जलड़ो, जलड़ा (ब०व०)

छाल

बगोट

त्वचा

खल्ला, खलड़ो

मांस

 मासु

हड्डी

 हडगि (स्त्री०), हडगो (पु०)

सींग

सिंग

चर्बी

चर्बि, बंविाळ

अंडा

अंडा

पूँछ

पुछड़ो (पु०), पुछड़ि (स्त्री०)

पंख

पंख्यूड़, पंखुर

बाल

बाळ

डर

डौर

सौगात

समूण, सैंदाण

ग्वाला

ग्वेर

उद्गम

सोत, मुंड्याळ

चूल्हा

चुल्लो

लकड़ियाँ

लाखड़ा

लकड़ी

लाखड़ो

बर्तन

भाण्डा

मेहमान

मैमान

विद्यार्थी

इस्कुल्या, विद्यार्थी

स्कूल

इस्कूल

क्यारी

क्यारि, बाड़ि, सग्वाड़ी

घर

घौर

बाराती

 पौंणा

स्मृति चिह्न

समळौण

चिल्लाहट

किल्कताळ, किलकार

मक्खियाँ

माखा

मक्खी

माखो (ए-व-)

भ्रमर

भौंर

मधुमक्खी

म्वारि

अनाज

नाज

हल

 हौळ

फाल

नसुड़ो

हलवाहा

हळ्या

खिड़की

मोरि

फर्श

म्याळो

सुबह

 सुबेर

दोपहर

द्वफरा

गोशाला

साळ, छानि

गाय

गौड़ि

-

 

क्रिया पद

हिन्दी

गढ़वाळि

पीना

पीण

खाना

खाण

काटना

काटण

देखना

देखण, हेरण

सुनना

सुणण

समझना

बींगण, समझण

जानना

जाणण

सोना

सेण

मरना

 मरण

मारना

म्वन्न

तैरना

बौति काटण, तैरण

उड़ना

उड़ण

चलना

हिटण

आना

आण

लेटना

लेटण, पोड़्ण

बैठना

बैठण

खड़ा होना

 खड़ु होण

देना

देण

कहना

 ब्वन्न

सो रहा है

सेणू छ

सोयेगा

 सेलु

सो गया

सेगि

पढ़ रहा है

पढ़णू छ, बांचणू छ

पढ़ा

पढ़ि

पढ़ेगा

पढ़लो

करना

कन्न

रो रहा है

रोणू छ

खा रहा है

खाणू छ

खाया

खायि

खायेगा

खालो

जाएगा

जालो

जा रहा है

जाणू छ

हँस रहा है

हैंसणू छ

उठ रहा है

उठणू छ

रमाकान्त बेंजवाल



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